Spirituality

धर्म आध्यात्मिक जीवन को सीमित नहीं कर सकता है

धर्म आध्यत्मिक जीवन को सीमित नहीं कर सकता है। धर्म और आध्यात्मिकता के बीच भेद क्या है? इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है। फिनलैण्ड का हन्नु मेरा सहपाठी था। हम दोनों लन्दन में पीएच डी की तैयारी कर रहे थे। मैं फ़्लैट में भी उसका साझेदार था। हन्नु घोर नास्तिक था और अभी भी है। मैं ने उसे निकट से जानने के बाद भी उसका बतिस्मा कर के उसका नाम सेंट हन्नु रख दिया था,यद्यपि ईश्वर या धर्म के लिये उसके जीवन के एजेन्डे मे कोई जगह नहीं थी। वह धर्म या ईश्वर के बिना भी एक समृद्ध आध्यात्मिक जीवन जी रहा था। एक व्यक्ति के रूप में उसके साथ रहना तमाम ‘धर्म’ वालों से कहीं ज़्यादा बेहतर था।url

हन्नु क्लास में सबसे ज़यादा पसंदीदा आदमी था, क्योंकि, और बातों के अलावा, इसलिये कि ज़रुरत पड़ने पर वह किसी की भी मदद करने को मौजूद रहता था और किसी ने भी उसे दूसरों की निंदा करते नहीं सुना था।अत: धार्मिक हुये बिना भी व्यक्ति आध्यात्मिक हो सकता है? इसका मतलब यह कहना नहीं है कि धर्म और अध्यात्म दोनों एक दूसरे के बिलकुल विपरीत हैं।

अध्यात्म के विकास में धर्म अक्सर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जैसाकि मदर टेरेसा के मामले में था, जिन्होने एक गहन आध्यात्मिक जीवन जिया और बिना जीज़स के वह अपना अस्तित्व सोच भी नहीं सकती थीं। हन्नु के उदाहरण में, धर्म के अभाव में आध्यात्मिकता में कोई कमी नहीं आई।

आध्यात्मिकता के गहनतर अनुभवों से प्रबुद्ध हुये लोग अक्सर धर्म के आदेशों के परे चले जाते हैं लेकिन अनिवार्यत: धर्म के विरुद्ध नहीं जाते हैं। उदाहरण के लिये, अधिकांश धर्मों मे प्रार्थना का एक निश्चित नियम है,लेकिन आप पायेंगे कि रहस्यवादी,चाहें वे किसी भी धर्म के हों, निश्चित रूपों से उठकर प्रार्थना के दूसरे स्तर पर पहुंच जाते हैं जहां उन्हे शब्दों की भी आवश्यकता नहीं रहती।

उन्हे ईश्वर के साथ संयोग के लिये गिरजाघर,मंदिर,मस्जिद या गुरुद्वारे जैसे विशेष प्रार्थना स्थल की ज़रूरत भी नही होती। धर्म और अध्यात्म के बीच में भेद क्यों किया जाय? सिर्फ इसलिये, जैसा कहा गया है,कि दुनिया की सर्वाधिक लड़ाईयाँ धर्म के नाम पर लड़ी गईं हैं।

आप तमाम संघर्षों के दर्शक रहे हैं जो धर्म के नाम पर हुये हैं और जिनकी परिणति हिंसा में हुई है। इससे लोग धर्म की भूमिका ही नहीं, जीवन मे इसकी आवश्यकता को लेकर भी उलझन में पड़ जाते हैं। जीज़स का जीवन और उपदेश यह दिखाते हैं कि उन्होने भी यह भेद किया था। उनकी आध्यत्मिकता अक्सर फारसियों की धार्मिक प्रथाओं के विरूद्ध होती थी, वे  उन कर्मकाण्डों के प्रति उनकी निष्ठा की अक्सर निंदा करते थे जिनमें आमजन के कल्याण की तनिक भी फिक्र नही थी।

“मैं तुमसे कहता हूं, जबतक तुम्हारी धर्मपरायणता सेरिबियों और फारसियों की धर्मपरायणता से आगे नहीं जायेगी, तुम किसी भी तरह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे”, और “झूठे पैग़म्बरों से सावधान रहो,जो तुम्हार पास भेड़ की खाल में आते है,लेकिन भीतर से वे भूखे भेड़िये होते हैं”।

बुद्ध के उपदेशों से भी यह प्रतीत होता है कि उन्होने भी धर्म और आध्यात्मिकता के बीच भेद किया था। यह विश्वास नहीं किया जाता है कि बौद्ध धर्म की अंतर्दृष्टि और ध्यान का व्यवहार दैवी रूप से उद्घाटित किया गया था, बल्कि आध्यात्मिकता के मार्ग पर व्यक्तिगत रूप से चलकर दुख की सच्ची प्रकृति की समझ से निकला था। चार आर्य सत्य बतलाते हैं कि दुख अस्तित्व का अंतर्भूत अंग है: दूख का मूल अज्ञान है और उस अज्ञान के मुख्य लक्षण मोह और तृष्णा हैं: अष्टमार्ग का अनुगमन करके मोह और लालसा का अंत किया जा सकता है: अष्टमार्ग मोह और लालसा के अंत की ओर ले जायेगा और इसलिये दुख के अंत की ओर।

Article by: डोमिनिक इमैनुएल

Source: Speakingtree.in

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